
डेस्क रिपोर्टर/ रायपुर का शासकीय विज्ञान महाविद्यालय सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की शैक्षणिक और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। 1948 में महज 126 छात्र-छात्राओं के साथ शुरू हुआ यह संस्थान आज लाखों सपनों को दिशा देने वाली ज्ञानस्थली बन चुका है। इस कॉलेज की कक्षाओं से निकले विद्यार्थियों ने राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, खेल और कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
1948 में रखी गई थी ज्ञान की नींव
आजादी के बाद जब देश नए निर्माण की राह पर आगे बढ़ रहा था, तब रायपुर में विज्ञान की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शासकीय विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना 1948 में हुई। शुरुआत में यहां केवल 126 विद्यार्थी अध्ययनरत थे। धीरे-धीरे यह संस्थान राजधानी ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में विज्ञान शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया।
1985 में इसे आदर्श महाविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठा मिली और 1988 में इसे स्वशासी महाविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ।
राजनीति से प्रशासन तक, निकले कई नामचीन चेहरे
साइंस कॉलेज की पहचान केवल विज्ञान की पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। यहां अध्ययन करने वाले अनेक विद्यार्थियों ने आगे चलकर देश और प्रदेश की राजनीति तथा प्रशासन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
कॉलेज के पूर्व विद्यार्थियों में पूर्व राज्यपाल रमेश बैस, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, लक्ष्मी नारायण इंदुजा, विक्रम उसेंडी, डॉ. रमेश अग्रवाल सहित कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
राजनीतिक क्षेत्र के अलावा प्रशासनिक सेवाओं में भी इस संस्थान के विद्यार्थियों ने उल्लेखनीय स्थान बनाया। सिविल सेवा में अनेक विद्यार्थियों ने अपनी सेवाएं दीं। विश्वविद्यालयों में कुलपति के पद तक पहुंचने वाले पूर्व विद्यार्थियों में अरुण दाबके, आर.के. ठाकुर, हर्षनिर्धन तिवारी और एस.के. पांडे जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।
कई विद्यार्थियों ने आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य सेवाओं में पहुंचकर देश-प्रदेश की सेवा की।
राष्ट्रसेवा की भावना से जुड़ी है पहचान
साइंस कॉलेज की एक खास पहचान इसके विद्यार्थियों की राष्ट्रसेवा से भी जुड़ी रही है। यहां अध्ययन करने वाले युवाओं में शिक्षा के साथ समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने पर जोर दिया जाता रहा है।
कॉलेज का ध्येय वाक्य ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ कर्म में कुशलता और समर्पण की प्रेरणा देता है। एनसीसी, रेडक्रॉस सोसायटी सहित विभिन्न गतिविधियां विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकारों से जोड़ती हैं।
84 एकड़ का ऐतिहासिक कैंपस और इंदिरा गांधी की याद
कॉलेज का विशाल परिसर करीब 84 एकड़ में फैला हुआ है। इस परिसर का उद्घाटन तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने कॉलेज परिसर में अशोक का पौधा भी लगाया था। वर्षों बाद भी वह पेड़ कॉलेज की ऐतिहासिक स्मृतियों को जीवंत करता है। यह पेड़ आज भी परिसर में आने वाली पीढ़ियों को उस दौर की कहानी सुनाता हुआ नजर आता है।
एक रात रुके थे लाल बहादुर शास्त्री
साइंस कॉलेज के इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से भी जुड़ा है।
जब शास्त्रीजी रायपुर आए थे, तब कॉलेज के मैदान में उनका कार्यक्रम निर्धारित था। कार्यक्रम के कारण उन्होंने कॉलेज के हॉस्टल के वार्डन रूम में एक रात विश्राम किया था।
शास्त्रीजी की उस स्मृति को आज भी कॉलेज ने संजोकर रखा है। यही वजह है कि कॉलेज का एक छात्रावास उनके नाम पर लाल बहादुर शास्त्री छात्रावास के रूप में जाना जाता है।
साइंस कॉलेज से निकला इंजीनियरिंग शिक्षा का भी रास्ता
साइंस कॉलेज परिसर का इतिहास केवल विज्ञान शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसी परिसर से कभी कॉलेज ऑफ माइंस एंड मेटलर्जी की शुरुआत हुई थी। आगे चलकर यही संस्थान शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में विकसित हुआ और आज इसे एनआईटी रायपुर के नाम से जाना जाता है।
यानी एक तरह से साइंस कॉलेज का परिसर छत्तीसगढ़ में आधुनिक तकनीकी शिक्षा की नींव रखने वाली महत्वपूर्ण जगहों में भी शामिल रहा है।
चार छात्रावास, एक लंबी विरासत
कॉलेज परिसर में विद्यार्थियों के लिए तीन छात्रावास हैं, जिनका नाम उमादास मुखर्जी, मेजर यशवंत गोरे और लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर रखा गया है। छात्राओं के लिए भी महिला छात्रावास की सुविधा उपलब्ध है।
इन छात्रावासों की दीवारों के बीच न जाने कितने विद्यार्थियों ने अपने सपनों को आकार दिया और फिर देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाई।
401 किताबों से शुरू हुआ सफर, अब एक लाख से ज्यादा पुस्तकें
1948 में महज 401 पुस्तकों से शुरू हुआ कॉलेज का ग्रंथालय आज विशाल संग्रह का रूप ले चुका है। वर्तमान में यहां एक लाख से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनमें मुख्य रूप से विज्ञान विषयों से संबंधित ग्रंथ शामिल हैं।
विज्ञान विषयों के अध्ययन के लिहाज से यह छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण पुस्तकालयों में गिना जाता है। हालांकि शोध के क्षेत्र में संस्थान के सामने अभी अपनी उपयोगिता और प्रभाव को और व्यापक बनाने की चुनौती है।
विज्ञान से सिनेमा तक, हर क्षेत्र में चमके विद्यार्थी
कॉलेज से पढ़कर निकले विद्यार्थियों ने डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक, कुलपति, राजनेता और वैज्ञानिक बनने के साथ कला और खेल के क्षेत्र में भी पहचान बनाई।
कॉलेज परिसर में देश के बड़े राजनेताओं के साथ बॉलीवुड कलाकारों और खिलाड़ियों का भी आगमन हुआ है। यही विविधता साइंस कॉलेज को महज एक कॉलेज नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की यादों और उपलब्धियों से जुड़ा संस्थान बनाती है।
78 साल की विरासत, आज भी जारी है सफर
1948 में 126 विद्यार्थियों से शुरू हुई यात्रा आज एक विशाल शैक्षणिक विरासत में बदल चुकी है। बदलते समय के साथ शिक्षा के तौर-तरीके बदले, तकनीक बदली और विद्यार्थियों की आकांक्षाएं भी बदलीं, लेकिन साइंस कॉलेज की मूल पहचान आज भी कायम है।
यह वह परिसर है जहां किताबों के साथ इतिहास भी पढ़ाया जाता है, जहां पेड़ भी पुरानी कहानी कहते हैं और हॉस्टल की दीवारों में देश के महान नेताओं की स्मृतियां आज भी सांस लेती हैं।
साइंस कॉलेज की कहानी दरअसल उन हजारों विद्यार्थियों की कहानी है, जिन्होंने यहां से ज्ञान लेकर अपने-अपने क्षेत्र में छत्तीसगढ़ और देश का नाम रोशन किया।
1948 से आज तक—ज्ञान की यह यात्रा जारी है।
