
डेस्क रिपोर्टर, रायपुर 16 मई 2026-
हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसी चीजें देखते हैं जो पहली नजर में आश्चर्यचकित कर देती हैं। उनमें से एक सवाल यह भी है कि छोटी सी लोहे की कील पानी में डालते ही डूब जाती है, लेकिन हजारों टन वजनी लोहे का जहाज समुद्र में आसानी से तैरता रहता है। आखिर ऐसा कैसे संभव है?
दरअसल, इसका जवाब विज्ञान के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत में छिपा है, जिसे “आर्किमिडीज का सिद्धांत” कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई वस्तु पानी में डाली जाती है तो पानी उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है, जिसे उत्प्लावन बल या बुआयंट फोर्स कहा जाता है। यदि यह बल वस्तु के वजन के बराबर या उससे अधिक हो जाए, तो वस्तु पानी में तैरने लगती है।
कील का आकार छोटा और ठोस होता है। उसमें हवा के लिए कोई जगह नहीं होती, इसलिए उसका घनत्व पानी से अधिक हो जाता है। यही कारण है कि कील पानी में डालते ही नीचे डूब जाती है।
वहीं दूसरी ओर जहाज का निर्माण विशेष तरीके से किया जाता है। जहाज अंदर से खोखला होता है और उसका आकार ऐसा बनाया जाता है कि वह अपने आसपास बहुत अधिक मात्रा में पानी को विस्थापित करता है। जहाज के अंदर हवा भरी होती है, जिससे उसका कुल घनत्व पानी से कम हो जाता है। परिणामस्वरूप पानी द्वारा लगाया गया उत्प्लावन बल जहाज के भारी वजन को संतुलित कर देता है और जहाज पानी पर तैरता रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी जहाज में पानी भरने लगे और उसका संतुलन बिगड़ जाए, तो उसका घनत्व बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में उत्प्लावन बल कम पड़ जाता है और जहाज डूबने लगता है। यही वजह है कि जहाजों की सुरक्षा और डिजाइन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
विज्ञान शिक्षकों का कहना है कि यह सिद्धांत केवल जहाजों तक सीमित नहीं है। इसी सिद्धांत के आधार पर पनडुब्बियां, नावें और यहां तक कि हॉट एयर बैलून भी काम करते हैं।
इस प्रकार छोटी सी कील और विशाल जहाज का अंतर हमें यह सिखाता है कि किसी वस्तु का केवल वजन ही नहीं, बल्कि उसका आकार, घनत्व और संरचना भी यह तय करती है कि वह पानी में डूबेगी या तैरेगी।
